मसूद आलम की कलम से:आज दलित नेताओं को खुलेआम अपनी बात कहते हुए और शासन में अपनी बात को कहते हुए हर हिंदुस्तानी का सर ऊंचा उठ जाता है जिसने भी भारतीय इतिहास के काले पन्ने पड़े हैं. जो यह बताते हैं कि इस मुल्क में हजारों वर्षों तक किसी दलित को राजनीति में भाग लेने की बात सोचना भी असंभव था क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार शासन करने का सपना देखने वाले दलित गर्म सलाखों से दागे जाने के योग्य थे.
आज दलितों को भाषण करते हुए देखकर हर हिंदुस्तानी का सीना चौड़ा हो जाता है. जिसको पता है कि किसी युग में उच्च जाति के लोगों के सामने ऊंचे स्वर में बात करने का प्रणाम भयानक हो सकता था. आज भीमा कोरेगांव जैसी स्मारक बनाने में सफल होने वाले दलितों को देखकर वह लोग प्रसन्न हैं जिनको इस बात का पता था कि ऊंची जात के लोगों के लिए बनाई गई बस्तियों में दलितों का रहना अपराध था. उनके लिए बस्तियों पृथक रूप से बनाई जाती थी. धीरे-धीरे युग परिवर्तन हुआ और बाहर से आए हुए बहुत से लोग दलित बस्तियों में रुकने लगे जिनमें विशेषकर मुस्लिम सौदागर और सूफी लोग थे.
जिन्होंने दलितों को यह आभास कराया कि दलित भी सामान्य लोगों की तरह है और उनका दलित होना भगवान की इच्छा नहीं किंतु धर्म के ठेकेदारों द्वारा बनाए गए विधान ने उनकी पशुओं की तरह जिंदगी व्यतीत करने पर विवश किया. इसी क्रम में जब कुछ दिनों पश्चात अंग्रेज व्यापारी भारत आए और उन्होंने इस देश में धीरे-धीरे समानता का कानून लागू करना प्रारंभ किया जिससे दलितों को कुछ मौलिक अधिकार मिला तत्पश्चात इन्हीं दलितों में से एक नवयुवक क्रांतिकारी भीमराव अंबेडकर बनकर पूरे देश में छा गया और उन्होंने इस देश को ऐसा संविधान दिया जिससे कोई भी दलितो को नीच समझने के योग्य नहीं रहा.
उसी क्रांतिकारी व्यक्ति के दिए हुए हिम्मत से संविधान में मिली हुई ताकत से दलित समाज बोल रहा है. भीमा कोरेगांव और पूरे महाराष्ट्र में वर्तमान में हुए संघर्ष दलित विरोधी तत्वो की चाल है जो दलित विरोधी हैं. परंतु संवैधानिक मजबूरियों से बोल नहीं पा रहे हैं. पुणे के भीमा कोरेगांव में दलितों के साथ जो भी घटनाएं घटी उसके पीछे यही दलित विरोधी मानसिकता काम कर रही है फिर पूरे देश का मीडिया सत्यता को छुपाते हुए उल्टे दलितों पर विभिन्न प्रकार के दोषारोपण करने में व्यस्त है महाराष्ट्र की पुलिस से दंगा कराने वाली भगवा संगठनों के हाथों में खेल रही है दंगा भड़काने वाले लोगों के खिलाफ कुछ ना करके दलितों को न्याय दिलाने वालों के विरुद्ध मुकदमा लिखे जा रहे हैं किंतु इन दमनकारी हथकंडों से दलितों की आवाज को दबाना असंभव है.
आज दलितों को भाषण करते हुए देखकर हर हिंदुस्तानी का सीना चौड़ा हो जाता है. जिसको पता है कि किसी युग में उच्च जाति के लोगों के सामने ऊंचे स्वर में बात करने का प्रणाम भयानक हो सकता था. आज भीमा कोरेगांव जैसी स्मारक बनाने में सफल होने वाले दलितों को देखकर वह लोग प्रसन्न हैं जिनको इस बात का पता था कि ऊंची जात के लोगों के लिए बनाई गई बस्तियों में दलितों का रहना अपराध था. उनके लिए बस्तियों पृथक रूप से बनाई जाती थी. धीरे-धीरे युग परिवर्तन हुआ और बाहर से आए हुए बहुत से लोग दलित बस्तियों में रुकने लगे जिनमें विशेषकर मुस्लिम सौदागर और सूफी लोग थे.
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| मसूद आलम |
जिन्होंने दलितों को यह आभास कराया कि दलित भी सामान्य लोगों की तरह है और उनका दलित होना भगवान की इच्छा नहीं किंतु धर्म के ठेकेदारों द्वारा बनाए गए विधान ने उनकी पशुओं की तरह जिंदगी व्यतीत करने पर विवश किया. इसी क्रम में जब कुछ दिनों पश्चात अंग्रेज व्यापारी भारत आए और उन्होंने इस देश में धीरे-धीरे समानता का कानून लागू करना प्रारंभ किया जिससे दलितों को कुछ मौलिक अधिकार मिला तत्पश्चात इन्हीं दलितों में से एक नवयुवक क्रांतिकारी भीमराव अंबेडकर बनकर पूरे देश में छा गया और उन्होंने इस देश को ऐसा संविधान दिया जिससे कोई भी दलितो को नीच समझने के योग्य नहीं रहा.
उसी क्रांतिकारी व्यक्ति के दिए हुए हिम्मत से संविधान में मिली हुई ताकत से दलित समाज बोल रहा है. भीमा कोरेगांव और पूरे महाराष्ट्र में वर्तमान में हुए संघर्ष दलित विरोधी तत्वो की चाल है जो दलित विरोधी हैं. परंतु संवैधानिक मजबूरियों से बोल नहीं पा रहे हैं. पुणे के भीमा कोरेगांव में दलितों के साथ जो भी घटनाएं घटी उसके पीछे यही दलित विरोधी मानसिकता काम कर रही है फिर पूरे देश का मीडिया सत्यता को छुपाते हुए उल्टे दलितों पर विभिन्न प्रकार के दोषारोपण करने में व्यस्त है महाराष्ट्र की पुलिस से दंगा कराने वाली भगवा संगठनों के हाथों में खेल रही है दंगा भड़काने वाले लोगों के खिलाफ कुछ ना करके दलितों को न्याय दिलाने वालों के विरुद्ध मुकदमा लिखे जा रहे हैं किंतु इन दमनकारी हथकंडों से दलितों की आवाज को दबाना असंभव है.

