राजस्थान के राजसमंद का वीडियो ना चाहते हुए भी देखा। मैं बधाई देना चाहता हूं उन ताकतों को जिन्होंने 95 साल के अनथक प्रयास के बाद आखिरकार हिंदू समाज के बीच से तालिबानी तत्वों को तैयार कर लिया। बधाई उन संगठनों को जिन्होंने हिटलर के प्रोपेगेंडा की हूबहू कॉपी कर 'लव जिहाद' जैसा मुद्दा बाकायदा झूठे-सच्चे तथ्यों और उदाहरणों के साथ ज़िंदा कर डाला। बधाई उन सभी सहयोगी संस्थाओं को भी जिन्होंने गैर हिंदुओं के खिलाफ भड़काए जा रहे गुस्से को तब तक पाला-पोसा जब तक कि खुलेआम हत्याएं शुरू नहीं हो गईं। नफरत का ये खेल अगर कच्चा ही खुल जाता तो हिंदुस्तान पर शासन करने की मंशा पाले गिरोह को रोका जा सकता था लेकिन हर किसी के थोड़े थोड़े प्रयास के बाद आखिरकार इस देश को 'अफगानिस्तान या पाकिस्तान' जैसा बना लेने पर बधाई स्वीकार करें। यकीन जानिए, इस देश ने अपना नया रास्ता ढूंढ लिया है। इसे उधर ही चलना है और आप रोक नहीं पाएंगे। धर्म और जाति के नाम पर सिविल वार साफ दिखाई दे रहा है। लिंचिंग के बाद अब सामूहिक नरसंहार होने लगें तो चौंकिएगा मत। आप इस रास्ते खुद आए हैं। इन सबको भड़काने के लिए चीन और पाकिस्तान पहले से ही मौजूद हैं।
क्या खालिस्तान और नक्सल विद्रोहियों को पहले नहीं भड़काया गया? फिर अब नया क्या है? आग तो अभी और ज़ोरदार लगेगी। राजसमंद जैसे वीडियो दिखाकर कश्मीर से कन्याकुमारी में बताया जाएगा कि ये देखो हिंदू तुम्हारा हाल ऐसा कर देंगे। वक्त है .. जागो और जिहाद फैलाओ। और आपको लगता है कि अगर किसी को इसलिए मार डाला गया क्योंकि वो मुसलमान है तो मुसलमान चुप रहेंगे? हम एक ही नस्ल के लोग हैं। इंतज़ार कीजिए, क्रियाओं की प्रतिक्रियाएं और प्रतिक्रियाओं की दूसरी प्रतिक्रियाओं को गिनते जाइए। हालात ऐसे होंगे कि आप और हम ज़िंदा रहे तो हिसाब नहीं लगा सकेंगे कि झगड़ा शुरू किसने और कैसे किया था.. राजसमंद के वीडियो में एक जीते-जागते इंसान को काट डाला गया। फिर आग लगा दी गई। इसके बाद हांफ हांफ कर भाषण दिया गया कि हिंदुस्तान से जिहाद हटा लो वरना यही हश्र किया जाएगा। इसी नीच और कायर का एक और वीडियो देखा। उसमें भी ऐसा ही भाषण दे रहा है और महाराणा प्रताप के नाम का इ्स्तेमाल कर रहा है। आखिर में खुद को राष्ट्रवादी माननेवालों को जय हिंद कहकर भी पटा रहा है। मुझे तो अभी तक समझ ही नहीं आया कि इंसानियत को शर्मसार करनेवाली इस हत्या का 'हिंद' से क्या लेना देना। ये हत्या तो हर हिंद वाले का सिर शर्म से झुका देने के लिए काफी है। कल एक दोस्त ने शिकायत की थी कि आपने बाबरी पर नहीं लिखा। मैंने नहीं लिखा था। सच तो ये है कि मुझे बाबरी से बड़े खतरे दिख रहे हैं तो उस पर क्या लिखूं। आपको दिखता नहीं कि बाबरी का फैसला हो चुका। कानून की दुहाई देकर उस समाज की आर्थिक नाकेबंदी की जा चुकी है जिसका लेनादेना बाबरी से था। चारों तरफ गौहत्या, अवैध मांस, मंदिर-मस्जिद, लव जिहाद का शोर करके बहुसंख्यक समाज को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा किया जा चुका है। मुसलमानों के एक तबके को इस कदर दरबारी बनाया जा चुका है कि वो विहिप से भी पहले अपने हाथों मंदिर बनाने को तैयार है। देश के सबसे बड़े पंचों ने कह दिया है कि फैसला बाहर कर लो। एक कमज़ोर और हताश पड़ चुके समुदाय से आप क्या उम्मीद कर रहे हैं? जो अपनी जान और रोज़ी की फिक्र के रोज़ पैदा होते नए संकटों से घिरा हो वो बाबरी पर क्या खाकर लड़ेगा। सवाल अब ये बचा कहां कि वो सही लड़ रहा था या गलत.. असल बात तो ये है कि उसकी लड़ने की ताकत छीन कर कहा जा रहा है कि बात करके फैसला कर लो। मज़बूत और कमज़ोर इंसान की आवाज़ में बराबर दम होता है क्या ? राजसमंद वाली हत्या एक चल निकले सिलसिले की ताज़ा कड़ी भर है। पहले भी ये होता रहा और अब आगे ये यूं ही होगा। फर्क इतना ही है कि इस बार वीडियो रिकॉर्डिंग हो गई। बहुत मुमकिन है कि अदालतों में घाघ वकील इस वीडियो रिकॉर्डिंग को चुनौती देकर झूठा साबित कर दें या फिर कोई अदालत 'समाज के सामूहिक विवेक को तुष्ट करने के लिए' हत्यारे को बरी भी कर सकती है, जैसा कह कर अफज़ल गुरू को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। अब जब फैसले अदालतों के बाहर ही होने हैं या फिर बहुमत के रुझान के हिसाब से किए जाने हैं तो वक्त आ गया है कि लिंचिंग वगैरह को कानूनी ठहरा दिया जाए। बेकार ही पुलिस को मुकदमे दर्ज करने पड़ते हैं, फिर जान जोखिम में डालकर गिरफ्तारियां करनी पड़ती हैं, आखिर में अदालतों में चल रहे करोड़ों केस में ऐसे मामले भीड़ अलग बढ़ाते हैं।
