जावेद अनीस
भारत हमेशा से एक बहुलतावादी समाज रहा है। जहां तरह तरह के विचार एक साथ फलते फूलते रहें। यही हमारी सबसे बड़ी ताकत रही है। लेकिन अचानक यहां किसी एक विचारधारा या सरकार की आलोचना करना बहुत खतरनाक हो गया है। इसके लिए आप राष्ट्र विरोधी घोषित किए जा सकते हैं और आपकी हत्या करके जश्न भी मनाया जा सकता है।
बहुत ही अफरा-तफरी का माहौल है जहा ठहर कर सोचने और संवाद करने की परिस्थितियां सिरे से गायब कर दी गई हैं। सब कुछ खांचो मे बट चुका है। हिन्दू बनाम मुसलमान, राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही। सोशल मिडिया ने 'लंगूर के हाथ उस्तरे' वाली कहावत सच साबित कर दी है। जिसे राजनैतिक शक्तियां बहुत ही संगठित तौर पर अपने हितो के लिए उपयोग कर रही हैं। पूरे देश मे एक खास तरह की मानसिकता और उन्माद को तैयार किया जा चुका है। यह एक ऐसी बिमारी है जिसका इलाज बहुत महंगा साबित होने वाला है और संभव है कि यह जानलेवा साबित हो।
समाज के साथ साथ मिडिया का बी धुव्रीकरण किया गया है । समाज मे खींची गई विभाजन रेखाएं मिडिया मे साफ नजर आ रही हैं। यहां भी अभिव्यक्ति की आजादी और असहमति की आवाजों को निशाना बनाया गया है। इसके लिए ब्लैकमेल, विज्ञापन रोकने, न झुकने वाले संपादको को निकालवाने जैसे हथकंडे अपनाए गए हैं। इस मुश्किल समय मे मिडिया को आजाद होना चाहिए था लेकिन लगभग आज पूरा मिडिया सरकार का डफली बजा रहा है। यहा पूरी तरह एक खास एजेंडा हावी हो गया है। पत्रकारो को किसी एक खेमे में शामिल होने और पक्ष लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए अभिव्यक्ति की आजादी और असहमति का अधिकार बहुत जरूरी है। फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्तेयर ने कहा था 'मै जानता हूं डो तुम कह रहे हो वह सही नही है। लेकिन तुम कह सको इस अधिकार की लडाई मे' मै अपनी जान भी दे सकता हूं' एक देश के तौर पर हमने भी नियति से एक ऐसा ही समाज बनाने का वादा किया था जहा सभी नागरिको को अपनी राजनैतिक विचारधारा रखने, उसका प्रचार करने और असहमत होने का अधिकार हो। लेकिन यात्रा के इस पड़ाव पर हम अपने इन मूल्यो से भटक चुके है। आज इस देश के नागरिक अपने विचारों के कारण मारे जा रहें हैं। जहा असहमति के आवाजों के लिए कोई जगह नहीं है।

